The Story Nook

Where ordinary people become extraordinary stories

Inspired by ordinary people and their extraordinary lives — every story here is a little slice of someone’s truth.

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Curated with love by Sugandha

तेरा मेरा साथ रहे

राहुल और प्रिया एक-दूसरे के घरों से बस कुछ कदमों की दूरी पर रहते थे। बचपन की हर याद, हर मुस्कान, हर खेल — सब एक साथ जिए थे उन्होंने। स्कूल जाना हो या घर का काम, खेलना हो या कोई शरारत — हर पल साथ ही बितता था।

दोस्ती नहीं थी बस, वो एक आदत बन गई थी। सुबह से लेकर रात तक, दिन के करीब 16 घंटे वो साथ रहते। बचपन का वो प्यारा सा रिश्ता धीरे-धीरे दिल की सबसे खास जगह बन गया था।

पर ज़िन्दगी की रफ्तार कब रुकी है किसी के लिए?

आठवीं कक्षा के बाद, प्रिया के पिताजी का तबादला किसी और शहर में हो गया। जिस दिन प्रिया का सामान लादकर गाड़ी रवाना हुई, राहुल गेट पर खड़ा बस उसे जाते हुए देखता रहा — कुछ बोल नहीं पाया, लेकिन कुछ अंदर टूट सा गया।

उन्होंने एक-दूसरे को खत लिखने का वादा किया। कुछ समय तक वो खत आते भी रहे। लेकिन फिर ज़िन्दगी आगे बढ़ती गई, पढ़ाई और जिम्मेदारियाँ बढ़ीं — और वो चिट्ठियाँ भी बंद हो गईं।

समय बीतता गया।
राहुल उच्च शिक्षा के लिए लंदन चला गया।
प्रिया ने फाइनेंस में मास्टर्स किया।

वो दोनों अपने-अपने सपनों में व्यस्त हो गए। पर कहीं ना कहीं, दिल के किसी कोने में एक अधूरी सी जगह बची रही… बिना नाम की, लेकिन बहुत गहरी।

फिर एक दिन, किस्मत ने एक खूबसूरत मोड़ लिया।

मुंबई में एक बड़ी वित्तीय कॉन्फ्रेंस के दौरान, प्रिया — अब एक सफल प्रोफेशनल — भीड़ में किसी को देखकर ठिठक गई। चेहरा जाना-पहचाना सा लगा। दिल ने धीरे से धड़कना शुरू किया।

नाम पट्टी पर नज़र गई — राहुल शर्मा

पल भर को वो वहीं रुक गई। और फिर खुद को रोके बिना, वो दौड़कर उसके पास गई और उसे कसकर गले से लगा लिया — जैसे वो सालों से रुकी एक सांस थी।

उस शाम उन्होंने एक कैफ़े में बैठकर बातें कीं — आठ घंटे तक। बातों ही बातों में 10 साल का फ़ासला मिट गया। वो सभी अधूरी कहानियाँ, अधूरे पल — सब जुड़ते चले गए।

जब वो अपने-अपने शहरों में लौटे, तो दिल पहले जैसा नहीं था।
प्रिया की नींद में अब राहुल का चेहरा था।
राहुल की हर मुस्कान में अब प्रिया की हँसी थी।

वो जो कभी दोस्ती थी, अब प्यार बन चुकी थी।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने जज़्बात एक-दूसरे से बांटे। और जब दोनों परिवारों ने ये सुना — तो जैसे पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं। शादी हुई, घर बना, बच्चे हुए — और ज़िन्दगी चल पड़ी… साथ में।

वक्त के साथ-साथ उनका रिश्ता और गहराता गया। जहाँ लोग शादी के बाद प्यार के खत्म होने की शिकायत करते हैं, वहीं राहुल और प्रिया हर साल एक-दूसरे के और करीब आ गए। उनका रिश्ता कभी ज़ोर से नहीं बोला — बस चुपचाप हर रोज़ जीता रहा।

10 साल… 20 साल… 35 साल बीत गए।

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपने बच्चों के साथ रहना शुरू किया। अब उनके दिन पोते-पोतियों की खिलखिलाहट से भर गए, लेकिन शामें अब भी सिर्फ एक-दूसरे की आँखों में गुजरती थीं।

अब उनका एक ही झगड़ा था — कौन पहले जाएगा?
दोनों चाहते थे कि दूसरे को अकेला ना छोड़ना पड़े।

और फिर आया उनका 60वाँ विवाह वर्षगांठ।

पूरा घर रोशनी से भर गया था। बच्चे, पोते-पोती, यहाँ तक कि पड़पोते भी — सब इकट्ठा थे। हँसी, प्यार और यादों से भरी रात थी वो।

डिनर और केक के बाद राहुल ने कहा, “थोड़ी थकान लग रही है…”
प्रिया मुस्कराई, “मुझे भी। चलो, अब आराम करते हैं।”

दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे अपने कमरे में चले गए।

अगली सुबह…
आठ बज चुके थे, लेकिन उनके कमरे से कोई आवाज़ नहीं आई।
अजीब सा लगा — राहुल तो अब तक अखबार लेकर बैठ जाते थे, प्रिया चाय बना रही होती…

चिंता हुई, बेटा कमरे में गया।

और जो उसने देखा — उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

राहुल और प्रिया — अपने बिस्तर पर, एक-दूसरे का हाथ थामे, शांत चेहरों के साथ लेटे हुए थे। जैसे किसी मीठी नींद में हों… एक ऐसी नींद जिससे अब कभी जागना नहीं था।

बाहर कहीं दूर से एक गाना बज रहा था —
तेरा मेरा साथ रहे…

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