शहर की पुरानी गलियों में एक सड़क है — एक ऐसी गली, जिसका नाम लेने से भी कई लोग कतराते हैं। जहाँ रातें सोती नहीं, और हर कोना किसी अधूरी कहानी की गवाही देता है। वहाँ जहाँ सस्ते रंगों की चमक और भारी साज-श्रृंगार के पीछे, हर औरत अपना दर्द छुपाकर खड़ी होती है… वहीं कहीं खड़ी होती है चंदा।
चंदा… उम्र बस बाईस या तेईस की। बाकियों से कुछ अलग — आँखों में एक अनकही चमक, और मुस्कान में कोई भूली-बिसरी मासूमियत। वही चंदा, जो सबसे ज़्यादा माँगी जाती है, और शायद इसलिए सबसे ज़्यादा जलाई भी जाती है।
और फिर एक दिन, उन तंग गलियों में दाख़िल होता है रोहन।
वो नज़रें नहीं घूरता, कीमत नहीं पूछता। बस एक कोने में बैठता है और बड़ी ही सहजता से पूछता है,
“तुम्हारी कहानी क्या है, चंदा?”
चंदा चौंक जाती है। ऐसा सवाल उससे कभी किसी ने नहीं पूछा।
न कभी किसी ग्राहक ने।
न किसी साथी औरत ने।
न खुद ज़िंदगी ने।
वो रुकती है। फिर एक गहरी साँस लेकर कहना शुरू करती है — अपने उन दिनों की कहानी जब वो बस एक बच्ची थी। माँ भी एक वेश्या थी, लेकिन दिल से माँ और बाप दोनों बन कर पाला था। स्कूल भेजा, सपने देखे और दिखाए। चंदा की चाहत थी — पायलट बनने की।
लेकिन ज़िंदगी ने मोड़ बदल दिया।
जब वह दसवीं में थी, माँ बीमार हुई और फिर चल बसी। माँ के साथ, उसके सपने भी दम तोड़ गए। और उसके सामने रह गई दो ही राहें — ख़ुद को खत्म कर लेना या उस रास्ते पर चल पड़ना जो माँ पीछे छोड़ गई थी।
चंदा ने जीने को चुना।
लेकिन सिर्फ़ साँसें नहीं, उसने हर पल को जीने की ठानी। दर्द में भी मुस्कुराई। हँसी में भी आँसू छुपाए। शायद इसलिए वो सबसे खास बन गई।
अब रोहन हर रात आता। चंदा से मिलने। छूने या देखने नहीं — सुनने।
हर दिन पूछता, “क्या लाऊँ कल तुम्हारे लिए?”
और चंदा मुस्कराकर कहती, “बिरयानी”, “पिज़्ज़ा”, “चाट”।
वे साथ बैठते, खाते, बातें करते और इस सिलसिले ने एक नई डोर को जन्म दिया — बिना नाम की, लेकिन बहुत गहरी।
फिर एक दिन, चंदा ने भी पूछा, “तुम यहाँ क्यों आते हो, रोहन?”
रोहन ने धीमे स्वर में बताया — उसे हाल ही में पता चला कि वह गोद लिया हुआ बच्चा है। अपने असली माता-पिता की खोज में जब वह पीछे गया, तो पाया कि उसकी जन्मदात्री एक वेश्या थी।
उसी सच्चाई को समझने के लिए वह इन गलियों में आया था। लेकिन चंदा से मिलकर… उसे कुछ और ही मिल गया। सुकून, अपनापन… और शायद एक ऐसा रिश्ता, जो दुनिया की समझ से परे था।
फिर एक दिन चंदा ने अपनी छोटी-सी इच्छा रोहन के सामने रखी —
“मैं भी एक दिन मॉल जाना चाहती हूँ… फिल्म देखना, नए कपड़े पहनना… जैसे और लड़कियाँ करती हैं… बस एक दिन के लिए।”
रोहन ने बिना एक पल गंवाए कहा, “चलो, कर देते हैं पूरा।”
ब्रोथल की मालकिन से इजाज़त ली, वादा किया कि लौटाएगा… और चंदा को पहली बार उस गली से बाहर निकाला।
वो दिन… जैसे चंदा फिर से जी उठी हो।
शॉपिंग, फ़िल्म, पॉपकॉर्न, सेल्फ़ी, हँसी — वो फिर से एक किशोरी बन गई थी।
आँखों में फिर से वही चमक लौट आई थी, जो कभी स्कूल की यूनिफॉर्म में झलकती थी।
दिन ढलने लगा, तो रोहन ने कहा,
“चलो, भाग चलते हैं… सब तैयारी कर ली है। एक नई ज़िंदगी, जहाँ कोई तुम्हें नहीं ढूँढ पाएगा। आज़ादी… डर के बिना।”
लेकिन चंदा ने… मुस्कुरा कर इंकार कर दिया।
“मैं अपनी किस्मत कब का अपना चुकी हूँ, रोहन,” उसने कहा।
“ये ही मेरी दुनिया है… मेरी लड़ाई, मेरा संघर्ष, और मेरी खुशी… सब यही है। लेकिन तुम्हारे साथ ये चार घंटे, जब मैं सिर्फ़ चंदा होती हूँ — ना कोई कीमत, ना कोई बोझ — बस मैं… यही मेरा सपना है। इसे मत छीनो मुझसे।”
रोहन कुछ नहीं कह सका।
बस उसका हाथ थाम लिया।
उन्होंने कभी अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया — वो प्रेम नहीं था, दोस्ती भी नहीं… शायद उससे कहीं ज़्यादा।
दो अधूरे लोग, एक-दूसरे की दरारों में रोशनी खोजते हुए।
और अब, हर रात, जब शहर सोता है और लाल बत्ती की रौशनी फिर जल उठती है — रोहन उस गली में आता है।
क्योंकि कभी-कभी, प्यार का मतललब साथ भाग जाना नहीं होता…
बल्कि… रोज़ लौट आना होता है।

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