हिंदी रूपांतरण
“ब्रिंदा… ओ ब्रिंदा! चल, घर चलने का समय हो गया।”
छह साल की ब्रिंदा ने खेलते-खेलते पीछे मुड़कर देखा।
कमर में साड़ी का पल्लू खोंसे, माथे पर पसीने की बूँदें और हाथ में सामान से भरा थैला लिए उसकी माँ उषा पार्क के बाहर खड़ी थी।
ब्रिंदा दौड़कर उसके पास पहुँची और थैले के भीतर झाँकते हुए बोली—
“माँ, आज क्या लाई हो?”
उषा मुस्कुरा दी।
“पहले घर चल। और हाँ, स्कूल का काम पूरा किया या नहीं?”
“हाँ माँ, कर लिया।”
ब्रिंदा ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया और माँ का हाथ पकड़कर चल दी। उसके मन में पढ़ाई से अधिक उत्सुकता उस थैले को लेकर थी।
उषा पास की एक बड़ी सोसाइटी के कई घरों में काम करती थी। हर सुबह सूरज निकलने से पहले उसका दिन शुरू हो जाता—किसी के घर में झाड़ू-पोंछा, कहीं बर्तन, कहीं कपड़े और कहीं खाना बनाने में मदद।
शाम तक उसका शरीर थक जाता था, लेकिन घर लौटते ही उसकी आँखें सबसे पहले ब्रिंदा की किताबें खोजतीं।
उषा स्वयं कभी स्कूल नहीं जा पाई थी।
एक छोटे किसान परिवार में जन्मी उषा पढ़ना चाहती थी। किताबों के अक्षर उसे हमेशा अपनी ओर खींचते थे, लेकिन घर की परिस्थितियों ने बहुत जल्दी उसके हाथों से किताबें लेकर जिम्मेदारियाँ थमा दीं। केवल पंद्रह वर्ष की उम्र में उसकी शादी रतन से कर दी गई।
रतन शहर में टैक्सी चलाता था। वह सुबह जल्दी निकलता और अक्सर देर रात घर लौटता। दोनों की कमाई से घर चल जाता था, लेकिन सपनों के लिए शायद ही कुछ बचता।
फिर भी उषा ने एक सपना सँभालकर रखा था—अपनी बेटी के लिए।
वह चाहती थी कि ब्रिंदा पढ़े, अपने पैरों पर खड़ी हो और अपने जीवन के फैसले स्वयं ले। जो अवसर उसे नहीं मिले, वे उसकी बेटी को जरूर मिलें।
पर छोटी-सी ब्रिंदा की दुनिया अलग थी।
वह अक्सर अपनी माँ को काम करते देखती और सहजता से कहती—
“मैं भी बड़ी होकर तुम्हारी तरह घरों में काम करूँगी।”
उषा का दिल जैसे एक पल के लिए रुक जाता।
“नहीं, ब्रिंदा,” वह उसके बाल सँवारते हुए कहती, “तू पढ़ेगी। खूब आगे जाएगी। तुझे किसी और की तरह नहीं, अपनी तरह बनना है।”
लेकिन ब्रिंदा को माँ की बातों में सपना कम और एक असंभव कहानी अधिक दिखाई देती थी।
समय बीतता गया।
छह वर्ष की वह चंचल बच्ची अब सोलह वर्ष की किशोरी बन चुकी थी। वह पढ़ाई में औसत थी। उषा के बार-बार समझाने, कभी मनाने और कभी डाँटने के बाद भी उसे लगता था कि ऊँची पढ़ाई और बड़ी नौकरियाँ केवल उन लोगों के लिए हैं जिनके पास पैसा, पहचान और सुविधाएँ हैं।
उसके हिस्से में शायद वही दुनिया लिखी थी जिसमें उसकी माँ जी रही थी।
फिर भी ब्रिंदा में एक गुण ऐसा था जिसे शायद वह स्वयं भी पूरी तरह नहीं पहचानती थी—वह बेहद उद्यमी थी।
कभी किसी बच्चे को पढ़ाकर, कभी किसी पड़ोसी का ऑनलाइन फॉर्म भरकर, तो कभी सोसाइटी की महिलाओं के छोटे-मोटे काम करके वह अपनी जेबखर्च निकाल लेती थी। समस्याएँ उसे डराती नहीं थीं। उन्हें देखते ही उसका मन उनके समाधान खोजने लगता था।
बारहवीं के बाद ब्रिंदा ने पास के कॉलेज में दाखिला ले लिया।
एक शाम वह किताब लेकर बैठी ही थी कि उसे बाहर से अपनी माँ और पड़ोस में रहने वाली मीतू की बातचीत सुनाई दी।
“उषा दीदी,” मीतू कह रही थी, “जिस घर में मैं काम करती थी, उनका तबादला हो गया। अब मेरे पास कोई काम नहीं है। कहीं काम की बात हो तो बताना।”
उषा ने उसे ढाँढस बँधाया।
“चिंता मत कर। मैं सोसाइटी में पूछूँगी। कोई न कोई घर मिल जाएगा।”
ब्रिंदा की आँखें किताब पर थीं, लेकिन उसका ध्यान उन दोनों की बातों पर टिक गया।
मीतू को काम चाहिए था।
और उन्हीं सोसाइटियों में कई परिवार अच्छे और भरोसेमंद घरेलू सहायक खोज रहे थे।
जरूरत दोनों ओर थी—लेकिन उन्हें जोड़ने वाला कोई नहीं था।
उस रात ब्रिंदा देर तक सो नहीं सकी।
अगले दिन उसने अपनी बस्ती में घर-घर जाकर पूछा कि कितनी महिलाएँ काम तलाश रही हैं। उसने उनके नाम, अनुभव, काम के घंटे और अपेक्षित वेतन एक कॉपी में लिखना शुरू किया।
फिर वह उन सोसाइटियों में गई जहाँ उसकी माँ काम करती थी। वहाँ उसने पूछा कि किन परिवारों को घरेलू सहायता चाहिए और वे किस तरह का काम करवाना चाहते हैं।
कुछ ही दिनों में उसकी कॉपी नामों, फोन नंबरों और जरूरतों से भर गई।
ब्रिंदा ने अपनी बचाई हुई छोटी-सी रकम से एक पुराना सेकंड-हैंड लैपटॉप खरीदा और सारी जानकारी उसमें दर्ज करनी शुरू कर दी।
उसने अपने इस छोटे-से प्रयास का नाम रखा—
“हाथ से हाथ”
एक हाथ, जिसे काम की जरूरत थी।
और दूसरा हाथ, जिसे सहयोग की।
शुरुआत में ब्रिंदा अपनी और अपनी माँ की व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर लोगों को आपस में मिलवाती। हर सफल जुड़ाव के बदले उसे थोड़ी-सी राशि मिल जाती।
मीतू को भी काम मिल गया।
फिर मीतू ने किसी और को ब्रिंदा के पास भेजा। एक परिवार ने दूसरे परिवार को बताया। धीरे-धीरे उसकी छोटी-सी सूची एक बड़े नेटवर्क में बदलने लगी।
लेकिन ब्रिंदा समझती थी कि केवल काम दिलाना पर्याप्त नहीं है। दोनों पक्षों के बीच भरोसा होना भी जरूरी था।
उसने घरेलू सहायकों के पहचान-पत्र, पते और पृष्ठभूमि की जाँच शुरू की। साथ ही उसने एक ऐसा निर्णय लिया जो उसके काम की सबसे बड़ी विशेषता बन गया—
सत्यापन केवल काम करने वालों का नहीं होगा; काम देने वाले परिवारों का भी होगा।
क्योंकि सुरक्षा, सम्मान और विश्वास पर अधिकार केवल घर के मालिकों का नहीं, उनके घरों में काम करने वाली महिलाओं का भी था।
ब्रिंदा ने स्वयं वेबसाइट बनाना सीखा और “हाथ से हाथ” को एक ऑनलाइन मंच का रूप दिया। अब परिवार अपनी जरूरत के अनुसार प्रशिक्षित और सत्यापित सहायता खोज सकते थे और काम तलाशने वाली महिलाएँ सुरक्षित घरों में सम्मानजनक रोजगार पा सकती थीं।
एक सोसाइटी से शुरू हुआ सफर दस सोसाइटियों तक पहुँचा।
फिर एक शहर से दूसरे शहर तक।
ब्रिंदा कॉलेज की पढ़ाई भी करती रही और अपने काम को भी सँभालती रही। जिस लड़की को कभी लगता था कि अवसर केवल विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए होते हैं, वह अब दूसरी महिलाओं के लिए अवसरों के दरवाजे खोल रही थी।
कुछ वर्षों बाद “हाथ से हाथ” केवल एक व्यवसाय नहीं रहा। वह उन हजारों महिलाओं की उम्मीद बन गया जो काम तो करना चाहती थीं, लेकिन सही अवसर और सुरक्षित वातावरण तक नहीं पहुँच पाती थीं।
एक दिन ब्रिंदा ने उषा के हाथ पकड़कर कहा—
“माँ, कल से तुम्हें किसी के घर काम पर नहीं जाना है।”
उषा ने चौंककर उसे देखा।
“पर घर…?”
ब्रिंदा मुस्कुराई।
“अब घर की चिंता मैं करूँगी। तुमने बहुत लोगों के घर सँवारे हैं, माँ। अब अपने घर में आराम करने का समय है।”
कुछ समय बाद ब्रिंदा ने अपने माता-पिता के लिए एक छोटा-सा सुंदर घर खरीदा।
गृहप्रवेश के दिन उषा दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उसके हाथ बार-बार नई दीवारों को छू रहे थे—मानो वह विश्वास करना चाहती हो कि यह सपना सचमुच उसका अपना है।
ब्रिंदा ने पीछे से आकर उसे बाँहों में भर लिया।
उषा ने उसके माथे को चूमते हुए कहा—
“मैं चाहती थी कि तू मेरी तरह किसी के घर काम न करे।”
ब्रिंदा ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं आज भी उन्हीं घरों और उन्हीं काम करने वाली महिलाओं के बीच हूँ, माँ। बस अब मैं उनके लिए रास्ते बना रही हूँ।”
“हाथ से हाथ” ने आगे चलकर स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर लड़कियों के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए। उन्हें कंप्यूटर चलाना, संवाद करना, अपने अधिकार समझना और छोटे व्यवसाय शुरू करना सिखाया जाने लगा।
ऐसे ही एक प्रशिक्षण केंद्र में ब्रिंदा कुछ लड़कियों से मिलने पहुँची।
उनके चेहरों पर वही झिझक थी जो कभी उसके भीतर हुआ करती थी। वही प्रश्न—क्या सपने देखना सचमुच उनके हिस्से में भी था?
एक लड़की ने संकोच से पूछा—
“दीदी, क्या हम भी आपकी तरह कुछ बड़ा कर सकती हैं?”
ब्रिंदा कुछ पल उसे देखती रही।
फिर मुस्कुराकर बोली—
“मेरी तरह क्यों? तुम अपनी तरह कुछ बड़ा करोगी।”
कमरे के एक कोने में बैठी उषा यह सब सुन रही थी।
उसकी आँखें भर आईं।
वर्षों पहले उसने अपनी बेटी के लिए एक सपना देखा था—कि वह पढ़ेगी, स्वतंत्र बनेगी और अपने जीवन के फैसले स्वयं करेगी।
ब्रिंदा ने उस सपने को केवल जिया नहीं।
उसने उसे हजारों लड़कियों के लिए एक रास्ता बना दिया।
क्योंकि सपने केवल वे नहीं होते जो हम रात को सोते हुए देखते हैं।
कुछ सपने हमें सोने ही नहीं देते।
और जब वे पूरे हो जाएँ…
तो उन्हें दूसरों के चलने के लिए रास्ता बन जाना चाहिए।
वह सपना उषा ने देखा था।
ब्रिंदा ने उसे जिया।
और अब…
वह उन सभी लड़कियों की आँखों में पल रहा था, जिन्होंने पहली बार अपने लिए सपने देखने शुरू किए थे।

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