पिता बनने से बहुत पहले ही देव ने अपने मन में एक बेटी का सपना सजा लिया था।
जब भी रिश्तेदार बेटों के हाथों परिवार का नाम आगे बढ़ने की बातें करते, वह मुस्कुराकर कहता—
“नाम तो कोई भी आगे बढ़ा सकता है। मुझे तो एक नन्ही-सी बेटी चाहिए, जो अपनी बातों और कहानियों से मेरा पूरा घर भर दे।”
शादी के पाँच वर्ष बाद, जब नर्स ने गुलाबी कपड़े में लिपटी उस नन्ही-सी जान को पहली बार उसकी बाँहों में सौंपा, तो देव उसे ऐसे देखता रह गया मानो पूरी कायनात ने अपना सबसे अनमोल ख़ज़ाना उसके हाथों में रख दिया हो।
“आँखें बिल्कुल तुम्हारे जैसी हैं,” अस्पताल के बिस्तर पर लेटी नैना ने थकी हुई आवाज़ में कहा।
देव ने तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं। इसकी आँखें मुझसे कहीं ज़्यादा सुंदर हैं।”
बच्ची ने पलभर के लिए अपनी आँखें खोलीं, अपना नन्हा-सा हाथ बढ़ाया और देव के अँगूठे को अपनी उँगलियों में कसकर पकड़ लिया।
बस, उतना ही काफ़ी था।
देव का दिल—जिसमें अब तक तनख़्वाह, बचत और महीने के खर्चों जैसी व्यावहारिक चीज़ें बसी रहती थीं—उस एक स्पर्श के सामने पूरी तरह हार गया।
“क्या नाम रखेंगे इसका?” नैना ने पूछा।
“परिधि,” देव ने कहा। “वह क्षितिज, जो अपने भीतर एक पूरी दुनिया समेटे रहता है।”
फिर उसने अपनी बेटी की ओर देखा।
“लेकिन मेरे लिए यह हमेशा मेरी ‘परी’ रहेगी।”
उस दिन के बाद देव की दुनिया परी से शुरू होकर परी पर ही समाप्त होने लगी।
हर शाम सरकारी दफ़्तर में वरिष्ठ लेखाकार की नौकरी से लौटकर वह अपना बैग दरवाज़े के पास रखता और ऊँची आवाज़ में पुकारता—
“कहाँ है पापा की परी?”
ठीक से चलना सीखने से पहले ही परी अपने दोनों हाथ फैलाए, डगमगाते क़दमों से उसकी ओर दौड़ पड़ती।
उसकी हँसी सुनते ही देव की दिनभर की सारी थकान जाने कहाँ ग़ायब हो जाती।
वह उसके लिए आँखें झपकाने वाली गुड़ियाँ लाता, उससे भी बड़े मुलायम खिलौने खरीदता, उसकी उम्र से कहीं कठिन पहेलियाँ ले आता और ऐसे अवसरों के लिए सुंदर-सुंदर कपड़े खरीदता, जो अभी आए भी नहीं थे।
“तुम्हें पता है न, इन सारे कपड़ों को पहनने से पहले ही ये उसे छोटे हो जाएँगे?” नैना उसे समझाती।
देव एक और नन्ही-सी फ्रॉक उठाकर कहता—
“लेकिन इसे देखो तो! साफ़ लग रहा है कि यह दुकान में सिर्फ़ हमारी परी का इंतज़ार कर रही थी।”
नैना सिर हिलाकर नाराज़ होने का अभिनय करती और फिर चुपचाप परी की पहले से भरी अलमारी में उस नई फ्रॉक के लिए जगह बना देती।
जब परी के स्कूल जाने का समय आया, तो देव ने शहर के सबसे अच्छे विद्यालयों में से एक को चुना।
नैना ने फ़ीस का विवरण देखा और चिंतित होकर देव की ओर देखा।
“देव, यह हमारे बजट से बहुत ज़्यादा है। शहर में और भी अच्छे स्कूल हैं।”
“मुझे पता है।”
“हर साल फ़ीस बढ़ेगी। किताबें होंगी, यूनिफ़ॉर्म होगी, गतिविधियों और आने-जाने का खर्च भी होगा।”
“यह भी पता है।”
“फिर?”
देव ने शयनकक्ष की ओर देखा, जहाँ चार वर्ष की परी अपनी गुड़ियों को वर्णमाला सिखाने में व्यस्त थी।
“हम किसी और चीज़ में कटौती कर लेंगे,” उसने कहा, “लेकिन उसके अवसरों में नहीं।”
अंकों ने देव को कभी उलझाया नहीं था। वह बैलेंस शीट समझता था, बजट बनाना जानता था और यह भी अच्छी तरह जानता था कि उसका परिवार कितना खर्च उठा सकता है—और कितना नहीं।
इसलिए उसने वहाँ भी गुंजाइश निकाल ली, जहाँ कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती थी।
दफ़्तर में पूरा दिन काम करने के बाद उसने शाम को एक कोचिंग संस्थान में गणित और लेखांकन पढ़ाना शुरू कर दिया।
घर लौटते-लौटते अक्सर परी सो चुकी होती।
उन रातों में देव कुछ देर उसके पास बैठता, उसके चेहरे पर बिखरे बालों को हटाता और धीरे से कहता—
“पापा आ गए, परी।”
कभी-कभी उसकी आँखें बंद ही रहतीं, लेकिन उसकी नन्ही उँगलियाँ नींद में भी देव का हाथ तलाशने लगतीं।
देव की सारी थकान मिटाने के लिए उतना ही पर्याप्त था।
परी का हर जन्मदिन पिछले जन्मदिन से कहीं बड़ा उत्सव बन जाता।
केक शहर की सबसे अच्छी बेकरी से आता। सजावट उसी कार्टून या कहानी के पात्र के अनुसार होती, जिसे उस वर्ष परी सबसे अधिक पसंद करती थी। और उसके उपहारों में लगभग हर वह चीज़ शामिल होती, जिसका ज़िक्र उसने पिछले कई महीनों में कभी-न-कभी किया होता।
एक जन्मदिन पर गुड़ियाघर खोलते हुए परी ने आश्चर्य से पूछा—
“पापा, आपको सब कुछ याद कैसे रहता है?”
देव ने गर्व से कहा—
“बिल्कुल याद रहता है। मैं अकाउंटेंट हूँ। हर बात का पूरा हिसाब रखता हूँ।”
लेकिन जीवन हमेशा उन योजनाओं का सम्मान नहीं करता, जिन्हें हम इतनी सावधानी से बनाते हैं।
जब परी आठ वर्ष की थी, नैना को लगातार खाँसी रहने लगी।
जो शुरुआत में एक ज़िद्दी संक्रमण जैसा लगा था, वह धीरे-धीरे जाँचों, अस्पताल के चक्करों और बंद दरवाज़ों के बाहर फुसफुसाकर की जाने वाली बातचीतों में बदल गया।
जाँच में पता चला कि नैना को अंतिम चरण का फेफड़ों का कैंसर था।
छह महीने के भीतर नैना चली गई।
अंतिम संस्कार के दिन घर लोगों से भरा हुआ था।
कुछ लोग रो रहे थे, कुछ देव को सलाह दे रहे थे और कुछ उसके भविष्य पर इस तरह चर्चा कर रहे थे, मानो वह उसी कमरे में बैठा उनकी बातें सुन नहीं रहा हो।
“अभी उसकी उम्र ही क्या है?”
“बच्ची को माँ की ज़रूरत पड़ेगी।”
“वह अकेला सब कुछ कैसे सँभालेगा?”
देव ने सबकी बातें सुनीं।
उस रात, जब सारे लोग जा चुके थे, उसने परी को नैना की अलमारी के पास फ़र्श पर बैठे पाया। वह अपनी माँ के दुपट्टे को चेहरे से लगाए हुए थी।
“पापा,” उसने पूछा, “अब मेरे स्कूल का खाना कौन बनाएगा?”
वह प्रश्न केवल अपने खाने की चिंता करती बच्ची का नहीं था।
वह एक डरी हुई छोटी-सी लड़की का प्रश्न था, जो जानना चाहती थी कि अब उसके जीवन से और क्या-क्या छिन जाने वाला है।
देव उसके पास फ़र्श पर बैठ गया।
“मैं बनाऊँगा।”
परी ने संदेह से उसकी ओर देखा।
“लेकिन आपको तो खाना बनाना आता ही नहीं है।”
“वह एक छोटी-सी तकनीकी समस्या है।”
“मम्मा कहती थीं कि एक बार आपने उबले हुए अंडे भी जला दिए थे।”
“तुम्हारी मम्मा बातों को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर बताती थीं।”
“उन्होंने कहा था कि सारा पानी सूख गया था और अंडे फट गए थे।”
देव कुछ क्षण चुप रहा।
“अच्छा…वह शायद एक बार हुआ था।”
कई दिनों बाद पहली बार परी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान दिखाई दी।
देव ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।
“मुझे वह सब करना नहीं आता जो तुम्हारी मम्मा किया करती थीं, परी। लेकिन मैं सीख सकता हूँ। और चाहे कुछ भी हो जाए—मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला।”
कई रिश्तेदारों ने देव को दूसरी शादी करने की सलाह दी।
उनकी नीयत बुरी नहीं थी, लेकिन देव केवल इसलिए किसी नए व्यक्ति को परी के जीवन में नहीं ला सकता था क्योंकि दुनिया को विश्वास था कि एक पुरुष अपनी बेटी को अकेले नहीं पाल सकता।
परी को माँ की आवश्यकता अवश्य थी।
लेकिन जिस माँ को वह खो चुकी थी, उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता था।
इसलिए देव ने किसी और को खोजने के बजाय स्वयं वह सब बनना चुना, जिसकी उसकी बेटी को आवश्यकता थी।
अगली सुबह देव ने खाना बनाना सीखना शुरू कर दिया।
उसकी पहली रोटियाँ गोल कम और किसी अनजान महाद्वीप के नक़्शों जैसी अधिक दिखाई देती थीं।
परी ने अपनी थाली में रखी रोटी को ध्यान से देखा।
“पापा, यह कैसी रोटी है?”
देव ने भी उसे कुछ क्षण देखा, मानो स्वयं पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
“यह एक विशेष आकार है।”
“किस चीज़ का आकार?”
“परियों के देश का।”
परी की आँखें चमक उठीं। “परियों का देश ऐसा दिखता है?”
“हाँ। और वहाँ कोई भी रोटी गोल नहीं होती।”
उस दिन परी ने पूरी रोटी खा ली।
अगले दिन देव की बनाई दाल में नमक इतना अधिक था कि एक चम्मच खाते ही परी ने पानी का पूरा गिलास ख़त्म कर दिया।
देव ने चिंतित होकर पूछा, “बहुत ख़राब बनी है?”
परी ने कुछ क्षण सोचा।
“नहीं…बस थोड़ी ज़्यादा स्वाद वाली है।”
उस रात परी के सो जाने के बाद देव फिर रसोई में लौट आया। उसने एक और कुकिंग वीडियो देखा और लगभग आधी रात तक गोल रोटियाँ बेलने का अभ्यास करता रहा।
धीरे-धीरे उसने टिफ़िन तैयार करना, यूनिफ़ॉर्म से दाग़ निकालना और सफ़ेद कपड़ों को रंगीन कपड़ों से अलग धोना सीख लिया।
उसे यह भी समझ में आया कि बेटी की चोटी बनाना वित्तीय विवरण तैयार करने से कहीं अधिक कठिन काम था—और एक जैसी दो रिबन बिना किसी के छुए भी रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो सकती थीं।
एक सुबह परी ने आईने में स्वयं को देखकर शिकायत की—
“पापा, यह वाली चोटी दूसरी वाली से ऊपर है।”
देव ने गर्दन टेढ़ी करके अपने काम का निरीक्षण किया।
“यह जानबूझकर किया गया है। नया स्टाइल है।”
“मैं टेढ़ी लग रही हूँ।”
“फ़ैशन को अक्सर अपने समय में समझा नहीं जाता।”
परी खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसने दोनों रबर बैंड निकाल दिए और देव को फिर से चोटी बनाना सिखाया।
देव ने अपनी शाम की कक्षाएँ ऑनलाइन कर लीं, ताकि परी के स्कूल से लौटने तक वह घर पर रह सके। वह दो कक्षाओं के बीच खाना बनाता, रात के भोजन के बाद परी का होमवर्क करवाता और उसके सो जाने के पश्चात अपना दफ़्तर का काम पूरा करता।
उसके त्याग कभी अपनी उपस्थिति की घोषणा नहीं करते थे।
जब उसके जूते घिस गए, उसने उन्हें ठीक करवा लिया।
जब स्कूटर बार-बार ख़राब होने लगा, उसने पहचानना सीख लिया कि किस आवाज़ को कुछ समय तक अनसुना किया जा सकता है और किसके लिए तुरंत मैकेनिक की आवश्यकता थी।
वह उन्हीं गिनी-चुनी कमीज़ों को तब तक पहनता रहा, जब तक उनके कॉलर फीके नहीं पड़ गए।
एक दोपहर वह और परी बाज़ार गए। इस बार देव को सचमुच अपने लिए एक नई कमीज़ खरीदनी थी।
लेकिन पुरुषों के कपड़ों की दुकान में प्रवेश करने से पहले परी एक दूसरी दुकान की खिड़की के सामने रुक गई।
“पापा, वह ड्रेस देखिए!”
डिस्प्ले की रोशनी में मैनिक्विन पर सजी नीली पोशाक झिलमिला रही थी।
देव ने उसे याद दिलाया, “तुम्हारी अलमारी में पहले ही पूरी दुकान जितनी ड्रेसेज़ हैं।”
“लेकिन बिल्कुल ऐसी एक भी नहीं है।”
“यह बहुत मज़बूत तर्क है।”
“मैं इसे पहनकर देख सकती हूँ? बस पहनकर?”
देव ने ड्रेस पर लगा मूल्य देखा।
फिर बगल वाली दुकान में कमीज़ों पर लगी सेल का बोर्ड।
उस शाम परी नीली ड्रेस को अपने सीने से लगाए घर लौटी।
और देव वही पुरानी, फीकी कमीज़ पहने लौटा, जिसे वह वर्षों से पहन रहा था।
परी कभी नहीं जान पाई कि देव ने अपने लिए जो पैसे बचाकर रखे थे, उन्हीं से उसकी ड्रेस खरीदी गई थी।
देव ने उसे बताया भी नहीं।
पिता अपने बच्चों को दिए गए प्रेम और त्याग का कभी हिसाब नहीं रखते।
परी जब तेरह वर्ष की होने वाली थी, तब देव के सामने एक ऐसी ज़िम्मेदारी आई जिसने इस आत्मविश्वासी व्यक्ति को भी घबरा दिया।
उसने किशोरावस्था के विषय में लेख पढ़े, एक डॉक्टर से बात की, मासिक धर्म और उससे जुड़ी देखभाल के बारे में जानकारी जुटाई और दवाइयों की दुकान में सैनिटरी पैड्स की पूरी कतार के सामने असहाय खड़ा रहा—जब तक कि काउंटर के पीछे बैठी महिला को उस पर दया नहीं आ गई।
परी के जन्मदिन से कुछ दिन पहले देव ने खाने की मेज़ पर उसके सामने एक छोटा-सा पैकेट रखा।
“यह क्या है?” परी ने पूछा।
देव उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
“परी, अब तुम बड़ी हो रही हो। तुम्हारे शरीर में कुछ बदलाव आएँगे। उनमें से एक है—तुम्हारे पीरियड्स शुरू होना।”
परी की आँखें फैल गईं।
“पापा!”
“क्या हुआ?”
“आप…उसके बारे में बात कर रहे हैं?”
“हाँ।”
“लेकिन आपको किसने बताया?”
“डॉक्टरों ने, किताबों ने, तुम्हारी विज्ञान की किताब ने, इंटरनेट ने…और दवाइयों की दुकान पर बैठी एक बहुत धैर्यवान आंटी ने।”
अपनी झिझक के बावजूद परी हँस पड़ी।
“आपने दुकान वाली आंटी से पूछा?”
“पूछना पड़ा। वहाँ इतने प्रकार के पैकेट थे कि मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। कुछ के तो पंख भी थे—लेकिन वे उस तरह के पंख नहीं थे, जिनकी मैंने कल्पना की थी।”
“पापा!”
देव मुस्कराया। उसे राहत थी कि परी हँस रही थी।
फिर उसकी आवाज़ गंभीर और कोमल हो गई।
“मेरी बात ध्यान से सुनो, परी। इसमें कुछ भी गंदा या शर्म की बात नहीं है। अगर यह स्कूल में शुरू हो जाए, तुम्हारी तबीयत ख़राब लगे या तुम्हें किसी चीज़ की आवश्यकता हो, तो तुम मुझे फ़ोन करोगी। तुम्हें मुझसे कभी कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं है।”
परी ने पहले पैकेट को देखा, फिर अपने पिता को।
“आपको ये सब खरीदने में शर्म नहीं आएगी?”
देव ने ईमानदारी से कहा—
“हो सकता है मैं दुकान में बीस मिनट तक उस शेल्फ़ को असहाय होकर देखता रहूँ, लेकिन अपनी बेटी की देखभाल करने में मुझे कभी शर्म नहीं आएगी।”
कुछ सप्ताह बाद परी स्कूल से अत्यंत उत्साहित होकर लौटी।
“पापा, आपको पता है आज क्या हुआ?”
देव ने लैपटॉप से नज़र उठाई।
“फिर कोई अचानक टेस्ट हो गया?”
“नहीं। मेरी कक्षा में एक लड़की को पहली बार पीरियड हुआ। वह बहुत डर गई थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। आपने जो पैड मेरे स्कूल बैग में रखा था, मैंने उसे दे दिया और फिर उसे हमारी टीचर के पास ले गई।”
देव ने अपना लैपटॉप बंद कर दिया।
“तुमने सब कुछ स्वयं सँभाल लिया?”
परी ने गर्व से सिर हिलाया।
“सब कह रहे थे कि मुझे इसके बारे में सबसे ज़्यादा पता है।”
“तुम्हारी विज्ञान की टीचर बहुत अच्छी होंगी।”
“मैंने उन्हें बताया कि मुझे मेरे पापा ने सिखाया है।”
देव की उँगलियाँ लैपटॉप के ऊपर स्थिर हो गईं।
“फिर उन्होंने क्या कहा?”
“उन्होंने कहा कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ।”
देव ने अपने सामने बैठी बेटी को देखा—आत्मविश्वासी, संवेदनशील और अपने शरीर को लेकर किसी भी संकोच से मुक्त।
“नहीं, परी,” उसने धीमे से कहा, “भाग्यशाली तो मैं हूँ।”
समय बीतता गया।
परी ने दसवीं की परीक्षा में पचानवे प्रतिशत अंक प्राप्त किए।
परिणाम देखते ही देव ने पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँट दी। दफ़्तर में उसने हर सहकर्मी को स्वयं बताया—चाहे उन्होंने पूछा हो या नहीं।
“मेरी बेटी के पचानवे प्रतिशत आए हैं।”
“बहुत बढ़िया! अब तो विज्ञान लेगी?”
“शायद।”
“डॉक्टर बनेगी या इंजीनियर?”
देव मुस्करा देता।
“वह जो बनना चाहेगी, वही बनेगी।”
लेकिन सच तो यह था कि परी अभी तक स्वयं नहीं जानती थी कि वह क्या बनना चाहती है।
रिश्तेदारों के सुझावों की कोई कमी नहीं थी।
“इतने अच्छे अंक आए हैं, विज्ञान ही लेना चाहिए।”
“आजकल कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बहुत अवसर हैं।”
“चार्टर्ड अकाउंटेंसी भी अच्छी रहेगी। आख़िर पिता अकाउंटेंट हैं।”
एक शाम देव ने परी को खाने की मेज़ पर चुपचाप बैठे पाया। सामने उसकी अंकतालिका रखी थी, पर चेहरे पर वह प्रसन्नता नहीं थी जिसकी उसे अपेक्षा थी।
“क्या हुआ?” देव ने पूछा। “पचानवे प्रतिशत कम लग रहे हैं? चाहो तो मैं स्कूल जाकर बाकी पाँच प्रतिशत के लिए बहस कर सकता हूँ।”
परी मुस्कराई नहीं।
“सब लोग पूछ रहे हैं कि मैं आगे क्या करूँगी।”
“तो बता दो।”
“मुझे नहीं पता।”
देव ने उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा—
“यह तो अच्छी बात है।”
परी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“अच्छी बात?”
“हाँ। इसका अर्थ है कि तुम्हारे सामने कई रास्ते खुले हैं।”
“लेकिन अगर मैंने ग़लत रास्ता चुन लिया तो?”
देव ने कुछ क्षण सोचा।
“तो मुड़कर दूसरा रास्ता चुन लेना।”
“इतना आसान नहीं होता, पापा।”
“नहीं होता,” उसने स्वीकार किया, “लेकिन किसी और के चुने रास्ते पर पूरी ज़िंदगी चलने से आसान अवश्य होता है।”
कुछ दिनों बाद देव ने ध्यान दिया कि परी अपना अधिकतर समय रसोई में बिताने लगी थी।
कभी वह इंटरनेट पर कोई नई रेसिपी देखती, कभी नैना की पुरानी डायरी में लिखे व्यंजन खोजती और कभी घर में उपलब्ध साधारण सामग्री से कुछ नया बनाने का प्रयास करती।
एक रविवार उसने देव के सामने एक प्लेट रखी।
उसमें चॉकलेट केक का एक टेढ़ा-सा टुकड़ा था। ऊपर की क्रीम एक ओर बह रही थी और बीच का हिस्सा थोड़ा बैठ गया था।
देव ने उसे ध्यान से देखा।
“यह किस देश का नक़्शा है?”
परी ने कमर पर हाथ रख लिया।
“यह केक है, पापा।”
“अच्छा! मुझे लगा मेरी रोटियों से प्रेरित कोई कलाकृति है।”
“पहले खाकर तो देखिए।”
देव ने एक निवाला लिया और उसका चेहरा गंभीर हो गया।
परी घबरा गई।
“बहुत ख़राब है?”
देव ने दूसरा निवाला लिया।
“नहीं। समस्या यह है कि अब मुझे रोज़ ऐसा ही केक चाहिए।”
परी का चेहरा खिल उठा।
उस दिन के बाद वह लगातार कुछ-न-कुछ बनाने लगी। देव उसके हर प्रयोग का सबसे उत्साही ग्राहक था—चाहे पास्ता अधपका रह गया हो, सूप आवश्यकता से अधिक तीखा हो या बिस्कुट इतने सख़्त बन गए हों कि उन्हें चाय में कई मिनट डुबोना पड़े।
वह हर बार पूरी गंभीरता से स्वाद लेता और कहता—
“अगली बार इसमें थोड़ा कम नमक।”
“इसमें तो नमक है ही नहीं, पापा।”
“तो फिर थोड़ा और चॉकलेट।”
धीरे-धीरे परी समझने लगी कि भोजन उसके लिए केवल खाना पकाना नहीं था।
उसे नए स्वादों की कल्पना करना अच्छा लगता था। साधारण सामग्री को किसी सुंदर व्यंजन में बदलना अच्छा लगता था। लेकिन सबसे अधिक उसे किसी के चेहरे पर पहला निवाला खाने के बाद आने वाली प्रसन्नता पसंद थी।
एक रात उसने हिम्मत करके कहा—
“पापा, मुझे शेफ़ बनना है।”
देव ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने केवल पूछा—
“पक्का?”
परी का आत्मविश्वास कुछ कम हो गया।
“मुझे पता है मेरे अंक अच्छे हैं। और सब लोग कह रहे हैं कि मुझे कोई ‘बड़ा’ करियर चुनना चाहिए। लेकिन मुझे खाना बनाना बहुत पसंद है।”
“शेफ़ बनना छोटा करियर किसने कहा?”
“बुआ कह रही थीं कि इतने अच्छे अंक लाकर रसोई में ही जाना था, तो पढ़ाई का क्या फ़ायदा?”
देव की आँखों में क्षणभर के लिए नाराज़गी उभरी, लेकिन उसकी आवाज़ शांत रही।
“अच्छी शिक्षा का अर्थ यह नहीं है कि तुम वही करो जिसे दुनिया प्रतिष्ठित समझती है। अच्छी शिक्षा तुम्हें यह समझने की क्षमता देती है कि तुम्हारे लिए सही क्या है।”
परी चुप रही।
देव ने आगे पूछा—
“तुम केवल खाना बनाना चाहती हो, या सच में इसे सीखना चाहती हो—उसका विज्ञान, अनुशासन, व्यवसाय…सब कुछ?”
“सब कुछ।”
“लंबे समय तक खड़े रहना होगा। रसोई में गर्मी होगी। सप्ताहांत और त्योहारों पर भी काम करना पड़ सकता है। शुरुआत आसान नहीं होगी।”
“मुझे पता है।”
“लोग तुम्हारे निर्णय पर सवाल उठाएँगे।”
“वह तो अभी से उठा रहे हैं।”
देव मुस्कराया।
“फिर हमें अच्छे कॉलेज खोजने चाहिए।”
परी कुछ क्षण उसे देखती रही, जैसे सुनिश्चित करना चाहती हो कि उसने ठीक सुना है।
“आप नाराज़ नहीं हैं?”
“क्यों?”
“आपने मेरी पढ़ाई पर इतना पैसा खर्च किया। शायद आपने मेरे लिए कुछ और सोचा होगा।”
देव ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसकी अंकतालिका बंद कर दी।
“मैंने तुम्हारी शिक्षा पर इसलिए खर्च नहीं किया कि एक दिन तुम्हारे जीवन का निर्णय मैं करूँ। मैंने इसलिए किया ताकि जब वह दिन आए, तुम अपना निर्णय स्वयं ले सको।”
परी की आँखें भर आईं।
“लेकिन शेफ़ बनने के लिए मुझे दूसरे शहर जाना पड़ सकता है।”
देव के हाथ की गति एक पल के लिए रुक गई।
फिर उसने सहज स्वर में कहा—
“तो जाओगी।”
“आप अकेले रह जाएँगे।”
“बिल्कुल नहीं। मेरे पास तुम्हारे छोड़े हुए कपड़े, जूते, किताबें और इस घर के हर कोने में फैला तुम्हारा सामान होगा। मुझे अकेला होने की जगह ही कहाँ मिलेगी?”
परी हँस पड़ी।
देव भी हँसा।
लेकिन उस रात, परी के सो जाने के बाद, वह बहुत देर तक बालकनी में बैठा रहा।
वह जानता था कि बेटी को पंख देना आसान बात नहीं होती।
जिस बच्ची के पहले क़दम पर उसने दोनों हाथ फैलाकर उसे गिरने से बचाया था, अब उसी बच्ची को अपने हाथों से इतनी दूर भेजना था जहाँ गिरने पर वह उसे तुरंत थाम नहीं सकता था।
फिर भी उसने देश के श्रेष्ठ होटल मैनेजमेंट और पाक-कला संस्थानों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी।
आवेदन शुल्क, शिक्षण शुल्क, छात्रावास, किताबें, यूनिफ़ॉर्म और उपकरण—उसने हर खर्च का विवरण एक स्प्रेडशीट में दर्ज किया।
कुल राशि देखकर वह देर तक स्क्रीन को देखता रहा।
उसकी बचत पर्याप्त नहीं थी।
अगले दिन उसने बैंक जाकर अपनी छोटी-सी सावधि जमा तुड़वा दी। शाम की कक्षाओं की संख्या बढ़ा दी और वर्षों से सोची जा रही घर की मरम्मत एक बार फिर टाल दी।
परी को उसने केवल इतना बताया—
“पैसों की चिंता तुम्हारी नहीं है। तुम्हारा काम प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना है।”
महीनों की मेहनत के बाद परी का चयन देश के एक प्रतिष्ठित पाक-कला संस्थान में हो गया।
प्रवेश पत्र पढ़ते ही वह चीखती हुई देव के गले लग गई।
“पापा! मेरा हो गया!”
देव ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“मुझे पता था।”
“आपको कैसे पता था?”
“मैं अकाउंटेंट हूँ। संभावनाओं का भी हिसाब रखता हूँ।”
कॉलेज जाने का दिन जितनी जल्दी आया, उतनी ही तेज़ी से देव का घर बक्सों और सूचियों से भर गया।
परी ने कपड़े रखे।
देव ने उन्हें निकालकर मौसम के अनुसार व्यवस्थित किया।
परी ने चार जोड़ी जूते रखे।
देव ने दो जोड़ी और जोड़ दिए।
“पापा, मैं पढ़ने जा रही हूँ या दुकान खोलने?”
“अलग-अलग अवसरों के लिए अलग जूते चाहिए।”
“यह बात उस व्यक्ति के मुँह से अच्छी नहीं लगती जो दस साल तक एक ही काले जूते पहनता रहा हो।”
देव ने उसकी बात अनसुनी कर दी और बैग में दवाइयों का एक अतिरिक्त डिब्बा रख दिया।
रेलवे स्टेशन पर परी उत्साहित थी। वह अपने नए कॉलेज, छात्रावास, नए मित्रों और पहली बार अकेले रहने के बारे में लगातार बोल रही थी।
देव उसकी हर बात सुनता रहा और बीच-बीच में वही निर्देश दोहराता रहा—
“समय पर खाना खा लेना।”
“रात में अकेले बाहर मत निकलना।”
“फ़ोन चार्ज रखना।”
“कोई परेशानी हो तो पहले मुझे फ़ोन करना।”
“हर दिन फ़ोन करना ज़रूरी है क्या?” परी ने छेड़ा।
देव ने गंभीर होकर कहा—
“नहीं। दिन में दो बार पर्याप्त है।”
परी हँस पड़ी।
ट्रेन चलने की घोषणा हुई तो उसकी हँसी अचानक थम गई।
उसने देव को गले लगा लिया।
“आप अपना ध्यान रखेंगे न?”
“बिल्कुल।”
“सिर्फ़ चाय और बिस्कुट पर नहीं रहेंगे?”
“मैं बहुत अच्छा खाना बनाता हूँ।”
“आपकी रोटियाँ अब भी कई देशों के नक़्शों जैसी बनती हैं।”
“भूगोल कभी व्यर्थ नहीं जाता।”
सीटी बजी।
परी ट्रेन में चढ़ गई और खिड़की के पास बैठकर हाथ हिलाने लगी।
देव प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा मुस्कराता रहा।
ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
परी का चेहरा खिड़की में छोटा होता गया और फिर दिखाई देना बंद हो गया।
देव तब भी कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
घर लौटते समय उसने आदत से मजबूर होकर सोचा कि परी के लिए शाम को क्या बनाया जाए।
फिर उसे याद आया—आज घर पर केवल वही होगा।
दरवाज़ा खोलते ही उसने हमेशा की तरह ऊँची आवाज़ में पुकारना चाहा—
“कहाँ है पापा की परी?”
शब्द उसके होंठों तक आए, लेकिन बाहर नहीं निकले।
घर वैसा ही था जैसा वह सुबह छोड़कर गया था।
सोफ़े पर परी का एक कुशन पड़ा था। खाने की मेज़ पर उसका पसंदीदा मग रखा था। कमरे में उसके परफ़्यूम की हल्की-सी ख़ुशबू अब भी थी।
सब कुछ था।
बस परी नहीं थी।
देव उसके कमरे में गया। बिस्तर ठीक किया, मेज़ पर खुली रह गई किताब बंद की और तकिए के पास पड़ा उसका पुराना मुलायम खिलौना उठाकर सावधानी से वहीं रख दिया।
फिर वह बिस्तर के किनारे बैठ गया।
वर्षों पहले, परी के सो जाने के बाद वह इसी तरह उसके पास बैठकर धीमे से कहा करता था—
“पापा आ गए, परी।”
आज पहली बार उसने ख़ाली कमरे में वही शब्द कहे—
“पापा यहीं हैं, परी।”
लेकिन इस बार उसका हाथ तलाशने वाली वे नन्ही उँगलियाँ वहाँ नहीं थीं।
कॉलेज पहुँचने के बाद पहले कुछ सप्ताह परी के लिए किसी नए संसार में प्रवेश करने जैसे थे।
हर दिन नए स्वाद, नई तकनीकें और नए शब्द उसके सामने खुलते। वह देव को फ़ोन पर उत्साह से बताती—
“पापा, आज हमने पाँच तरह के सॉस बनाना सीखा।”
“अच्छा? उनमें से कोई हमारी दाल को बचा सकता है?”
“हमारी दाल को क्या हुआ?”
“तुम्हारे जाने के बाद उसमें स्वाद आना बंद हो गया है।”
“आपने नमक डाला था?”
फ़ोन के दूसरी ओर कुछ क्षण चुप्पी रही।
“नमक डालना आवश्यक होता है?”
परी समझ जाती कि देव फिर मज़ाक कर रहा है। लेकिन कुछ ही दिनों में उसे यह भी समझ आने लगा कि उसके पिता सचमुच अपने खाने का ध्यान नहीं रख रहे थे।
वह वीडियो कॉल पर पूछती—
“आज रात क्या खाया?”
“बहुत पौष्टिक भोजन।”
“क्या?”
“गेहूँ, दूध और थोड़ी-सी चीनी।”
“बिस्कुट?”
“तकनीकी रूप से तुम उसे बिस्कुट कह सकती हो।”
परी नाराज़ होती, फिर उसे कोई आसान रेसिपी समझाती। देव पूरे धैर्य से सुनता, सामग्री लिखता और अगले दिन दावा करता कि उसने बिल्कुल वैसा ही बनाया था।
“फोटो भेजिए।”
“खाना खाने के लिए होता है, फोटो खींचने के लिए नहीं।”
“मतलब फिर ख़राब बना है।”
“स्वाद और सुंदरता का हमेशा साथ होना आवश्यक नहीं है।”
कॉलेज में परी के दिन आसान नहीं थे।
रसोई की गर्मी, लगातार कई घंटों तक खड़े रहना, हाथों पर छोटे-छोटे घाव और हर व्यंजन में पूर्णता की अपेक्षा—जल्द ही उसे समझ आ गया कि अपने सपने से प्रेम करना और उसे जीना दो अलग बातें होती हैं।
एक दिन प्रैक्टिकल परीक्षा में उसका बनाया व्यंजन अस्वीकार कर दिया गया।
शेफ़ ने प्लेट को देखते ही कहा—
“तुम्हारे पास कल्पना है, लेकिन अनुशासन नहीं। केवल उत्साह से कोई अच्छा शेफ़ नहीं बनता।”
परी ने पूरा दिन किसी से बात नहीं की।
रात को देव का फ़ोन आया तो उसने सामान्य दिखने की कोशिश की।
“सब ठीक है?”
“हाँ।”
“आज क्या बनाया?”
“कुछ नहीं।”
“तबीयत ख़राब है?”
“नहीं।”
“किसी ने कुछ कहा?”
परी चुप हो गई।
देव उसकी ख़ामोशी की भाषा तब से समझता था जब वह बोलना भी नहीं जानती थी।
“क्या हुआ, परी?”
उसकी आवाज़ सुनते ही परी की आँखों से आँसू बह निकले।
“शायद मैं इसके लिए बनी ही नहीं हूँ, पापा।”
उसने देव को परीक्षा के बारे में बताया। फिर वे सारी बातें भी कह दीं जिन्हें वह पूरे दिन भीतर दबाए बैठी थी—
“बाकी सब मुझसे बेहतर हैं। किसी के माता-पिता का रेस्तराँ है, किसी ने पहले से प्रशिक्षण लिया है। मुझे तो बहुत-सी बुनियादी चीज़ें भी नहीं आतीं। शायद बुआ ठीक कहती थीं। मैंने इतने अच्छे अंकों के बाद ग़लत रास्ता चुन लिया।”
देव ने उसे रो लेने दिया।
फिर शांत स्वर में पूछा—
“तुम्हें याद है, पहली बार जब तुमने चलना शुरू किया था तो कितनी बार गिरी थीं?”
“मुझे कैसे याद होगा?”
“मुझे याद है। सत्रह बार।”
परी की सिसकियों के बीच हल्की-सी हँसी निकल गई।
“आपने गिना था?”
“मैं अकाउंटेंट हूँ।”
“पापा…”
“हर बार गिरने के बाद तुमने मेज़ पकड़कर फिर खड़े होने की कोशिश की थी। अगर पहली बार गिरने पर तुम यह तय कर लेतीं कि चलना तुम्हारे लिए नहीं है, तो आज कॉलेज की रसोई में इतने घंटे खड़ी कैसे रहतीं?”
“यह अलग बात है।”
“बिल्कुल अलग है। तब तुम्हारे दाँत भी नहीं थे।”
परी हँस पड़ी।
देव की आवाज़ फिर गंभीर हो गई।
“एक ख़राब दिन तुम्हारी क्षमता का निर्णय नहीं कर सकता। लेकिन यह ज़रूर बता सकता है कि तुम्हें अभी क्या सीखना है। कल अपने शेफ़ के पास जाओ। उनसे पूछो कि तुम्हारे व्यंजन में कहाँ कमी थी। फिर उसे दोबारा बनाओ।”
“और अगर फिर ख़राब बना?”
“तो तीसरी बार बनाना।”
“फिर भी नहीं बना तो?”
“चौथी बार। गिनती मुझे मत सिखाओ।”
अगली सुबह परी अपने प्रशिक्षक के पास गई।
उसने उनकी आलोचना से बचने के स्थान पर उसे समझना चाहा। फिर वही व्यंजन दोबारा बनाया—एक बार, दो बार, पाँच बार।
छठी बार शेफ़ ने प्लेट चखी और बिना मुस्कराए कहा—
“अब तुम सीख रही हो।”
परी ने तुरंत देव को संदेश भेजा—
“पास हो गई!”
कुछ ही क्षण में उत्तर आया—
“मुझे पता था।”
“हर बार यही क्यों कहते हैं?”
“क्योंकि मैं हर बार सही होता हूँ।”
धीरे-धीरे परी ने अपनी जगह बना ली।
पहले वर्ष के अंत तक वह कक्षा के श्रेष्ठ विद्यार्थियों में थी। दूसरे वर्ष में उसने एक राष्ट्रीय पाक-कला प्रतियोगिता के लिए अपना नाम भेजा। उसका व्यंजन नैना की पुरानी रेसिपी से प्रेरित था—साधारण भारतीय स्वादों को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास।
प्रतियोगिता के दिन देव सबसे आगे वाली पंक्ति में बैठा था।
उसने अपनी वही पुरानी कमीज़ पहन रखी थी, जिसे परी बचपन से देखती आई थी। लेकिन इस बार उसने उसके ऊपर एक नया कोट पहन लिया था—शायद इसलिए कि परी ने फ़ोन पर तीन बार कहा था कि यह “बहुत बड़ा कार्यक्रम” है।
परी मंच पर काम कर रही थी और देव हर कुछ मिनट में अपनी घड़ी देख रहा था, जैसे समय समाप्त होने की चिंता प्रतियोगी से अधिक उसे हो।
परिणाम घोषित हुआ—
परी ने दूसरा स्थान प्राप्त किया था।
वह मंच से उतरकर सीधे देव के पास आई।
“मैं जीत नहीं पाई,” उसने धीमे से कहा।
देव ने उसके हाथ में पकड़ी ट्रॉफ़ी को देखा।
“यह क्या है?”
“दूसरे स्थान की ट्रॉफ़ी।”
“तो फिर हार कहाँ गई?”
“पहला स्थान किसी और को मिला।”
“और आज से पहले तुम कहाँ थीं?”
परी ने कुछ नहीं कहा।
“अपने सपने के पहले दिन से आज तक तुम कितनी दूर आई हो, यह देखो। जीवन में हमेशा आगे खड़े व्यक्ति को देखकर अपनी दूरी मत नापना। कभी-कभी पीछे मुड़कर भी देखना चाहिए।”
परी ने ट्रॉफ़ी उसकी ओर बढ़ाई।
“इसे आप रखिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसमें आधी मेहनत आपकी है।”
देव ने ट्रॉफ़ी वापस उसके हाथों में रख दी।
“तुम्हारे रास्ते में मैंने केवल रोशनी की है, परी। चली तुम स्वयं हो।”
कॉलेज समाप्त होने से पहले ही परी को एक प्रतिष्ठित होटल में प्रशिक्षण का अवसर मिल गया।
उसकी पहली नौकरी में वेतन बहुत अधिक नहीं था, काम के घंटे लंबे थे और शुरुआत में उसे वे काम भी करने पड़ते जिन्हें कोई और नहीं करना चाहता था।
सब्ज़ियाँ काटना।
स्टोर की गिनती करना।
रसोई बंद होने के बाद सफ़ाई जाँचना।
दूसरों की ग़लतियों के लिए डाँट सुनना।
कई बार रात के दो बजे तक काम करने के बाद वह थककर अपने कमरे में पहुँचती और बिना खाना खाए सो जाती।
लेकिन हर सुबह देव का संदेश उसका इंतज़ार कर रहा होता—
“पानी पीना मत भूलना।”
“आज नाश्ता किया?”
“तुम शेफ़ हो। स्वयं भूखी रहोगी तो पेशे की प्रतिष्ठा का क्या होगा?”
एक रात बहुत देर से परी का फ़ोन आया।
“पापा, आज पहली बार मेरे बनाए व्यंजन की एक ग्राहक ने विशेष प्रशंसा की।”
देव बिस्तर पर सोने की तैयारी कर रहा था, लेकिन तुरंत उठकर बैठ गया।
“क्या कहा उसने?”
“उसने कहा कि उसे अपनी माँ के हाथ के खाने की याद आ गई।”
फ़ोन के दोनों ओर कुछ क्षण मौन रहा।
परी ने धीमे से कहा—
“मैंने वह व्यंजन माँ की डायरी से बनाया था।”
देव की नज़र अलमारी में रखी नैना की तस्वीर पर चली गई।
“तुम्हारी माँ होती तो आज पूरे होटल को बता देती कि वह रेसिपी उसकी है।”
“और आप क्या करते?”
“मैं बिल देखकर सुनिश्चित करता कि उन्होंने तुम्हारे व्यंजन के पूरे पैसे लिए हैं।”
परी हँसी, लेकिन देव की आँखें नम थीं।
वर्ष बीतते गए।
परी प्रशिक्षु से शेफ़ बनी और फिर होटल की सबसे कम उम्र की सूस-शेफ़ में से एक। अख़बार में उसका छोटा-सा साक्षात्कार छपा तो देव ने उसकी कई प्रतियाँ ख़रीद लीं।
एक उसने घर में फ्रेम करवाई।
एक अपने दफ़्तर ले गया।
एक हर उस रिश्तेदार को भेजी जिसने कभी कहा था कि अच्छे अंकों वाली लड़की को रसोई में नहीं जाना चाहिए।
संदेश के साथ उसने केवल लिखा—
“परी की नई उपलब्धि। आशीर्वाद दीजिएगा।”
परी ने फ़ोन करके कहा—
“आपको सबको भेजने की क्या ज़रूरत थी?”
“मुझे लगा उन्हें जानकर प्रसन्नता होगी।”
“पापा, आप बहुत चालाक हैं।”
“मैंने तुम्हें अकेले बड़ा किया है। थोड़ी समझदारी तो विकसित होनी ही थी।”
पहली तनख़्वाह से परी ने देव के लिए एक नई कमीज़ खरीदी।
हल्के नीले रंग की।
लगभग वैसी ही, जैसी वह बचपन में दुकान की खिड़की पर देखा करती थी।
घर आकर उसने पैकेट देव को दिया।
“मेरे लिए?”
“नहीं, पड़ोस के शर्मा अंकल के लिए। आप खोलिए।”
देव ने कमीज़ बाहर निकाली और देर तक उसे देखता रहा।
“इतने पैसे ख़र्च करने की क्या आवश्यकता थी?”
“आपने भी तो मेरे लिए नीली ड्रेस खरीदी थी।”
देव ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“तुम्हें याद है?”
“ड्रेस याद है। यह नहीं पता था कि आपने उसके लिए क्या छोड़ा था।”
देव कुछ नहीं बोला।
परी ने उसकी पुरानी, फीकी कमीज़ की बाँह को छुआ।
“अब पता है।”
अगली सुबह देव ने नई कमीज़ पहन ली।
परी ने उसकी तस्वीर खींचते हुए कहा—
“बहुत अच्छे लग रहे हैं।”
देव ने आईने में स्वयं को देखा।
“कमीज़ अच्छी है।”
“और पहनने वाला?”
“वह पहले से ही अच्छा था।”
दोनों हँस पड़े।
परी की दुनिया अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी।
उसका काम, उसके नए मित्र, यात्राएँ और भविष्य की योजनाएँ थीं। अब वह हर दिन फ़ोन नहीं कर पाती थी। कभी दो दिन निकल जाते, कभी तीन।
जब भी देर से फ़ोन करती, देव कहता—
“अरे, तुम कौन?”
“पापा!”
“माफ़ करना, मेरी एक बेटी हुआ करती थी। उसका नाम भी परी था।”
“मैं व्यस्त थी।”
“अच्छा है। इसका अर्थ है तुम आगे बढ़ रही हो।”
वह कभी शिकायत नहीं करता था।
लेकिन परी की हर कॉल के बाद वह फ़ोन कुछ देर अपने हाथ में थामे रहता।
फिर एक दिन बात करते-करते देव को अचानक तेज़ खाँसी आने लगी।
“पापा, आप ठीक हैं?”
“हाँ, पानी ग़लत रास्ते से चला गया था।”
“डॉक्टर को दिखाया?”
“खाँसी के लिए डॉक्टर? तुम्हारी पीढ़ी हर चीज़ का विशेषज्ञ खोजती है।”
“आपको कई दिनों से खाँसी है।”
“मौसम बदल रहा है।”
“आपकी आवाज़ भी बहुत थकी हुई लग रही है।”
“उम्र के साथ आवाज़ में गंभीरता आती है।”
परी को उसकी बात पर हँसी नहीं आई।
“कल डॉक्टर के पास जाइए।”
“कल मेरी कक्षा है।”
“कक्षा रद्द कर दीजिए।”
“बच्चों की परीक्षा आने वाली है।”
“पापा…”
“ठीक है,” देव ने बात समाप्त करने के लिए कहा, “चला जाऊँगा।”
लेकिन वह नहीं गया।
कुछ सप्ताह बाद परी को देव के पड़ोसी का फ़ोन आया।
“बेटा, घबराना मत। देवजी अब ठीक हैं। बस कल बाज़ार में थोड़ी देर के लिए चक्कर खाकर गिर गए थे।”
परी के हाथ से चम्मच छूटकर फ़र्श पर गिर गया।
“गिर गए थे?”
“हाँ। शायद कमजोरी थी। हम उन्हें अस्पताल ले गए थे। उन्होंने तुम्हें बताने से मना किया था। कह रहे थे तुम्हारा कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम है।”
परी ने उसी क्षण देव को फ़ोन किया।
उसने तीसरी घंटी पर फ़ोन उठाया।
“परी—”
“आप अस्पताल गए थे?”
दूसरी ओर मौन छा गया।
“किसने बताया?”
“यह महत्वपूर्ण नहीं है। आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“तुम्हारी होटल की समीक्षा थी।”
“तो?”
“मैं नहीं चाहता था कि तुम परेशान हो।”
“आपने ही तो कहा था कि कोई परेशानी हो तो सबसे पहले आपको फ़ोन करूँ।”
“वह नियम तुम्हारे लिए था।”
“क्यों?”
देव के पास उत्तर नहीं था।
परी की आवाज़ भर्रा गई।
“क्योंकि आप पिता हैं, इसलिए आपको दर्द नहीं होता? आपको डर नहीं लगता? या आपको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती?”
“ऐसी बात नहीं है।”
“तो फिर मुझे अपनी बेटी कब समझेंगे? केवल वह बच्ची नहीं जिसकी आपको देखभाल करनी है—वह बेटी जो आपकी देखभाल भी कर सकती है।”
देव चुप रहा।
परी ने अपने आँसू पोंछे।
“मैं कल सुबह आ रही हूँ।”
“आने की आवश्यकता नहीं है। मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
“मैंने आपकी अनुमति नहीं माँगी।”
फ़ोन कट गया।
देव कुछ क्षण स्क्रीन को देखता रहा।
फिर नैना की तस्वीर की ओर देखकर मुस्कराया।
“बिल्कुल तुम्हारी तरह बोलने लगी है।”
अगली सुबह दरवाज़े की घंटी बजी।
देव ने दरवाज़ा खोला तो सामने परी खड़ी थी—एक हाथ में बैग, दूसरे में खाने के डिब्बे और आँखों में ग़ुस्सा, चिंता और प्रेम एक साथ।
“आप आ गईं?” देव ने सहज बनने का प्रयास किया।
परी भीतर आई और बैग नीचे रख दिया।
“अब कुछ दिनों तक आप वही करेंगे जो मैं कहूँगी।”
“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”
“और मैं शेफ़ हूँ। इस घर में खाने-पीने के मामलों में मेरी वरिष्ठता अधिक है।”
देव ने विरोध करना चाहा, लेकिन परी ने उसे गले लगा लिया।
बहुत दिनों बाद वह अपने पिता के सीने से वैसे ही लगी थी जैसे बचपन में किसी डरावने सपने के बाद लगा करती थी।
बस इस बार डर उसे अपने लिए नहीं लगा था।
देव ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“मैं ठीक हूँ, परी।”
परी ने उसे और कसकर पकड़ लिया।
“आपको हमेशा ठीक रहने की आवश्यकता नहीं है, पापा।”
देव की उँगलियाँ उसके बालों पर ठहर गईं।
वर्षों तक उसने परी को यह विश्वास दिया था कि कमज़ोर पड़ना शर्म की बात नहीं होती, सहायता माँगना कमजोरी नहीं होती और अपना डर कह देना साहस होता है।
लेकिन शायद वह यह सब स्वयं पर लागू करना भूल गया था।
परी उससे अलग हुई और बोली—
“कल हम डॉक्टर के पास जाएँगे।”
“कल मेरी कक्षा—”
“रद्द हो चुकी है।”
“तुमने मेरी कक्षा रद्द कर दी?”
“हाँ।”
“मुझसे पूछे बिना?”
“आपने अस्पताल जाने से पहले मुझसे पूछा था?”
देव ने कुछ क्षण उसे देखा।
फिर अपनी मुस्कान छिपाते हुए बोला—
“तुम्हें इतना आत्मविश्वासी बनाकर मैंने बहुत बड़ी भूल कर दी।”
परी ने उसका हाथ थाम लिया।
“अब भुगतिए।”
जिस बेटी को देव ने जीवन भर गिरने से पहले थामा था, उस दिन पहली बार वही बेटी उसका हाथ थामकर डॉक्टर के कमरे तक ले गई।
जाँच में कोई बड़ा ख़तरा सामने नहीं आया, लेकिन डॉक्टर ने आराम, नियमित दवाइयों और समय पर भोजन की सख़्त हिदायत दी।
घर लौटते समय परी ने देव की दवाइयाँ अपने बैग में रख लीं।
“ये मुझे दे दो,” देव ने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि मरीज़ मैं हूँ।”
“इसीलिए तो मैं रख रही हूँ।”
देव ने हार मानते हुए खिड़की के बाहर देखा।
“बेटियाँ बड़ी होकर बहुत तानाशाह हो जाती हैं।”
परी ने उसका हाथ दबाया।
“पिताओं से ही सीखती हैं।”
कुछ दिनों बाद परी काम पर लौट गई, लेकिन अब देव के फ़ोन में दवाइयों के अलार्म थे, पड़ोसी शर्मा अंकल के पास उसकी अतिरिक्त चाबी थी और हर रात वीडियो कॉल पर परी यह सुनिश्चित करती कि उसने खाना खा लिया है।
देव कभी-कभी कैमरा खाली प्लेट पर घुमाकर कहता—
“सबूत पर्याप्त है, माननीय शेफ़?”
“प्लेट आपने धोकर भी रखी हो सकती है।”
“इतना अविश्वास? मैंने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं?”
“आपने मुझे अकाउंटेंट की बेटी बनाया है। बिना supporting document के कुछ स्वीकार नहीं होगा।”
जीवन फिर अपनी गति से चलने लगा।
कुछ वर्ष बाद परी को होटल की एक विदेशी शाखा में महत्त्वपूर्ण assignment मिला। यह उसके करियर का बड़ा अवसर था, लेकिन पहली बार उसे इतने लंबे समय के लिए देश से बाहर जाना था।
हवाई अड्डे पर विदा करते समय देव ने उसके बैग का वज़न तीन बार जाँचा, पासपोर्ट चार बार देखने को कहा और पाँचवीं बार पूछा कि उसने कुछ खाया है या नहीं।
“पापा, मैं assignment पर जा रही हूँ, किसी दूसरे ग्रह पर नहीं।”
“मेरे लिए दोनों की दूरी लगभग बराबर है।”
विदेश में काम कठिन था, दिन लंबे थे और समय का अंतर दोनों की बातचीत को छोटा कर देता था। फिर भी रविवार की सुबहें उनकी थीं—कभी लंबी वीडियो कॉल, कभी बस चाय के साथ कुछ मिनट का मौन।
वहीं परी की मुलाक़ात ध्रुव से हुई। वह उसी शहर में काम करता था। उसके स्वभाव में एक सहज ठहराव था—वह परी की महत्त्वाकांक्षा से डरता नहीं था, उसकी व्यस्तता को शिकायत नहीं बनाता था और देव के बारे में उसकी अनगिनत कहानियाँ पूरे ध्यान से सुनता था।
दीवाली पर परी ने देव को बताया कि उसकी उड़ान रात में पहुँचेगी। लेकिन उड़ान पैंतालीस मिनट पहले उतर गई।
आगमन द्वार से बाहर निकलते ही उसने देव को देखा—हाथ में इतना बड़ा फूलों का गुलदस्ता लिए कि उसका आधा चेहरा उसके पीछे छिप गया था।
परी ने दौड़कर उसे गले लगा लिया। देव भी सब भूलकर उसे वैसे ही बाँहों में भर लिया जैसे वर्षों पहले स्कूल के पहले दिन के बाद भरा था।
कुछ क्षण बाद उसकी नज़र परी के पीछे खड़े ध्रुव पर गई।
“और ये?” देव ने पूछा, मानो नाम वह पहले से न जानता हो।
परी थोड़ी झिझकी।
“पापा, ये ध्रुव हैं।”
ध्रुव ने आगे बढ़कर नमस्ते की। देव ने हाथ मिलाया और उसे कुछ क्षण गौर से देखा।
“खाना बनाना आता है?”
ध्रुव ने ईमानदारी से कहा, “चाय और अंडा। दोनों कभी-कभी अच्छे बन जाते हैं।”
देव ने गंभीरता से सिर हिलाया।
“ठीक है। घर में एक शेफ़ पर्याप्त है। लेकिन बर्तन?”
“वो अच्छे से धो लेता हूँ,” ध्रुव ने कहा।
“तो बातचीत आगे बढ़ सकती है।”
परी ने आँखें घुमाईं, लेकिन उसकी मुस्कान छिपी नहीं।
कुछ महीनों बाद परी और ध्रुव ने विवाह कर लिया। विदाई के समय देव ने बहुत संयम बनाए रखा। उसने परी के सिर पर हाथ रखा, ध्रुव को गले लगाया और केवल इतना कहा—
“इसे कभी उड़ने से मत रोकना।”
ध्रुव ने उत्तर दिया—
“आपने जो पंख दिए हैं, उनकी इज़्ज़त करूँगा।”
उस रात घर लौटकर देव ने पहली बार महसूस किया कि सन्नाटा भी आवाज़ करता है। परी का कमरा वैसा ही था—किताबें, माँ की रेसिपी वाली डायरी, अलमारी में बचपन की नीली ड्रेस का एक सँभाला हुआ टुकड़ा—लेकिन घर से उसकी रोज़मर्रा की आहट चली गई थी।
वह कमरे की बत्ती बंद करने लगा, फिर रुक गया।
“रहने दो,” उसने स्वयं से कहा, “जब आएगी तो कहेगी घर अँधेरा कर रखा है।”
समय बीतता गया। एक शाम वीडियो कॉल पर परी असामान्य रूप से चुप थी। ध्रुव उसके पास बैठा मुस्करा रहा था।
“क्या बात है?” देव ने पूछा। “तुम दोनों ने कुछ तोड़ा है?”
परी की आँखें चमक उठीं।
“पापा…आप नाना बनने वाले हैं।”
देव कुछ क्षण बिल्कुल स्थिर बैठा रहा।
“सच?”
परी ने सिर हिलाया।
देव की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन आवाज़ में वही पुराना हास्य था।
“तो फिर मुझे जल्दी से अपनी कहानियाँ व्यवस्थित करनी होंगी। बच्चे को शुरू से पता होना चाहिए कि उसकी माँ कितनी शरारती थी।”
“आप कोई झूठी कहानी नहीं सुनाएँगे।”
“मैं अकाउंटेंट हूँ। सारे रिकॉर्ड सुरक्षित हैं।”
परी को क्या पता था कि उन हँसी के पीछे देव अपने स्वास्थ्य की कुछ और सच्चाइयाँ छिपा रहा था। पिछले महीनों में उसे दो हल्के दिल के दौरे पड़ चुके थे। हर बार उसने डॉक्टर और शर्मा अंकल से परी को न बताने का आग्रह किया।
“वह माँ बनने वाली है,” उसने कहा था। “उसे अभी डर नहीं, ख़ुशी चाहिए।”
लेकिन इस बार देव ने एक काम टाला नहीं। उसने अपने काग़ज़ व्यवस्थित किए—बैंक लॉकर की चाबियाँ, बचत खातों में नामांकन के दस्तावेज़ और घर के काग़ज़। उन सबके ऊपर उसने एक लिफ़ाफ़ा रखा, जिस पर उसके हाथ से लिखा था—
“मेरी परी के लिए।”
एक सुबह शर्मा अंकल वह पैकेट परी के घर पहुँचा गए।
“तुम्हारे पापा ने देने को कहा था,” उन्होंने नज़रें चुराते हुए कहा। “बस कुछ ज़रूरी काग़ज़ हैं।”
चाबियाँ और दस्तावेज़ देखते ही परी का दिल घबरा उठा। उसने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला।
मेरी सबसे प्यारी परी,
इन चाबियों और काग़ज़ों को देखकर घबराने से पहले यह समझ लो कि तुम्हारे पापा आख़िरकार अपने सारे हिसाब व्यवस्थित कर रहे हैं। तुम जानती हो, अधूरे खाते मुझे कभी पसंद नहीं रहे।
लॉकर, बचत और इस घर से जुड़े सभी विवरण साथ रख दिए हैं। लेकिन इन्हें अपनी विरासत मत समझना। मेरी असली विरासत इनमें नहीं है। वह तुम्हारे भीतर है—तुम्हारी हिम्मत में, तुम्हारी करुणा में, गिरकर फिर उठ खड़े होने की आदत में और अपने मन की आवाज़ सुनने के साहस में।
जिस दिन तुम पैदा हुईं, मैंने तुम्हें अपनी बाँहों में लिया और सोचा कि तुम्हें दुनिया में चलना सिखाना मेरी ज़िम्मेदारी है। तब मैं नहीं जानता था कि इस दुनिया में जीना तुम मुझे सिखाओगी।
तुम्हारी माँ के जाने के बाद मैं बहुत डरा हुआ था, परी। मुझे डर था कि कहीं मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त न हो पाऊँ। मैंने गलतियाँ कीं—तुम्हारी चोटियों में, तुम्हारे टिफ़िन में, तुम्हारी नाराज़गी समझने में और शायद कई बार तुम्हारी चुप्पी पढ़ने में भी। लेकिन तुमने हर बार मेरा हाथ थामे रखा, जैसे मैं तुम्हें नहीं, तुम मुझे बड़ा कर रही थीं।
जब तुमने पाक-कला चुनने की बात कही, मुझे तुम्हारी राह की कठिनाई दिखाई देती थी; फिर भी मैंने तुम्हारे निर्णय पर भरोसा किया। आज समझता हूँ कि पिता का काम बेटी के लिए रास्ता चुनना नहीं, उसके चुने रास्ते पर रोशनी रखना होता है। कॉलेज, तुम्हारा काम, तुम्हारी जीतें, तुम्हारी हारें—हर पड़ाव पर मुझे तुम पर गर्व रहा। उस समय भी, जब तुम्हें स्वयं पर विश्वास नहीं था।
फिर ध्रुव तुम्हारे जीवन में आया। तुम्हारी आँखों में उसके लिए सम्मान देखकर मुझे भरोसा हुआ कि तुमने केवल साथी नहीं, एक ऐसा घर चुना है जहाँ तुम्हारे पंखों के लिए जगह है। उसे मेरा आशीर्वाद देना—और यह भी कहना कि बर्तन धोने की उसकी योग्यता को मैंने कभी हल्के में नहीं लिया।
अब तुम स्वयं माँ बनने वाली हो। शायद किसी दिन तुम्हें भी वह डर महसूस होगा जो तुम्हारे जन्म के दिन मैंने किया था—क्या मैं इस नन्ही-सी जान के लिए पर्याप्त हो पाऊँगी? उस दिन अपने आप से कहना: प्रेम को पूर्ण होना नहीं आता; उसे बस उपस्थित रहना आता है। बाकी सब बच्चा और माता-पिता साथ-साथ सीख लेते हैं।
यह घर तुम्हारा है, लेकिन उससे कहीं अधिक यह तुम्हारी वापसी की जगह है। जीवन तुम्हें चाहे जितनी दूर ले जाए, यहाँ तुम्हारे लिए एक कमरा, एक रोशनी और तुम्हारे पापा की प्रतीक्षा हमेशा रहेगी।
और जब कभी मेरी बहुत याद आए, मुझे तस्वीरों में मत ढूँढ़ना। मुझे उस स्त्री में देखना जो तुम बन गई हो—जो मेहनत से नहीं डरती, प्रेम को कमज़ोरी नहीं समझती और किसी अपने का हाथ थामने के लिए लौट आती है। वहीं मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।
ध्रुव को मेरा आशीर्वाद देना। और उस नन्हे मेहमान से कहना कि नाना उससे मिलने के लिए अभी से बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।
तुम चाहे जितनी बड़ी हो जाओ, हमेशा रहोगी—
पापा की परी।
अपने पूरे प्रेम के साथ,
पापा
परी ने पत्र को अपने सीने से लगा लिया। आँसू शब्दों को धुँधला कर रहे थे, फिर भी वह अंतिम पंक्ति बार-बार पढ़ती रही।
तभी उसका फ़ोन बजा।
स्क्रीन पर ध्रुव का नाम था।
उसने कॉल उठाई, लेकिन दूसरी ओर कुछ क्षण केवल साँसों की आवाज़ आई।
“परी…”
ध्रुव की आवाज़ सुनते ही उसके भीतर कुछ टूट गया।
देव को उस सुबह फिर दिल का दौरा पड़ा था। इस बार वह अपनी परी के फ़ोन का इंतज़ार करते-करते, बहुत शांति से, नैना की तस्वीर के पास बैठा हुआ चला गया था।
कुछ महीने बाद परी ने एक बेटे को जन्म दिया।
उसने उसका नाम रखा—वेद।
देव के नाम के अक्षरों में जैसे समय ने एक नया क्रम बना दिया था—देव से वेद। एक जीवन विदा हुआ था, दूसरा उसकी रोशनी लेकर आया था।
जब नर्स ने वेद को पहली बार परी की बाँहों में रखा, वह देर तक उसे देखती रही। फिर उसके नन्हे माथे को चूमकर फुसफुसाई—
“तुम्हारे नाना तुम्हें एक कहानी सुनाना चाहते थे।”
और उसने कहना शुरू किया—
“एक बार की बात है, एक साधारण-सा आदमी था…जो अपनी बेटी के लिए पूरी दुनिया बन गया।”
जिस पिता ने जीवन भर अपनी बेटी के रास्ते में रोशनी रखी थी, वह अब उसकी स्मृतियों में नहीं, उसके जीने के ढंग में बसता था।
क्योंकि कुछ पिता कभी सचमुच जाते नहीं—
वे अपनी बेटियों के साहस में,
उनकी हँसी में,
और उनके लौट आने की आदत में जीवित रहते हैं।

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